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लोककला की अमर स्वर-साधिका: पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को भावभीनी श्रद्धांजलि
By mb Update Team · 05 Jul 2026, 9:24 pm IST
डॉ. तीजन बाई (जन्म: 24 अप्रैल 1956, छत्तीसगढ़) का निधन भारतीय लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। वे पंडवानी की प्रसिद्ध कापालिक शैली में महाभारत की कथाओं का ओजस्वी गायन और जीवंत अभिनय करती थीं। उन्हें पद्मश्री (1988), पद्म भूषण (2003), पद्म विभूषण (2019) तथा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान मिले। उन्होंने भारतीय लोककला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनका दमदार स्वर, अभिनय और तंबूरे के अनूठे प्रयोग ने पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनका योगदान सदैव अमर रहेगा।
लोककला की अमर स्वर-साधिका: पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को भावभीनी श्रद्धांजलि
भारतीय लोककला जगत ने एक ऐसी महान कलाकार को खो दिया है, जिसकी आवाज़, अभिनय और कला की गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी। पद्म विभूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का निधन भारतीय संस्कृति और लोक परंपरा के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने अद्भुत गायन और अभिनय से न केवल देश, बल्कि पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को नई पहचान दिलाई।
डॉ. तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग (वर्तमान बलौदा बाज़ार-भाटापारा क्षेत्र से जुड़े सांस्कृतिक परिवेश) में हुआ था। बचपन से ही उन्हें लोकसंगीत और महाभारत की कथाओं में गहरी रुचि थी। उन्होंने अपने नाना से पंडवानी गायन सीखा और कठिन सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद अपनी प्रतिभा के दम पर विश्व मंच तक पहुंचीं।
पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक प्रसिद्ध लोकगायन शैली है, जिसमें महाभारत की कथाओं का गायन और अभिनय किया जाता है। डॉ. तीजन बाई विशेष रूप से कापालिक शैली की कलाकार थीं। इस शैली में कलाकार केवल गीत नहीं गाता, बल्कि अपने अभिनय, चेहरे के भाव, आवाज़ और शारीरिक अभिव्यक्ति से भीम, अर्जुन, द्रौपदी, दुर्योधन और अन्य पात्रों को जीवंत कर देता है। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का धनुष और कभी युद्ध का प्रतीक। उनकी दमदार आवाज़, ऊर्जावान प्रस्तुति और प्रभावशाली संवाद दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे।
डॉ. तीजन बाई ने अपनी कला के माध्यम से भारतीय लोक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने अनेक देशों में प्रस्तुतियां देकर यह साबित किया कि लोककला की कोई सीमा नहीं होती। उनकी प्रस्तुतियों ने दुनिया भर के दर्शकों को भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा से परिचित कराया।
उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), पद्म भूषण (2003) और देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (2019) प्रदान किया। इसके अलावा उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। वे भारतीय लोककलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहीं और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का कार्य करती रहीं।
डॉ. तीजन बाई ने यह सिद्ध किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर अभ्यास और अपनी संस्कृति के प्रति समर्पण किसी भी व्यक्ति को विश्व स्तर पर पहचान दिला सकता है। उनका जीवन संघर्ष, प्रतिभा और सफलता का अद्भुत उदाहरण है। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी पंडवानी और उनकी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत सदैव जीवित रहेगी।
डॉ. तीजन बाई को विनम्र श्रद्धांजलि। भारतीय लोककला की यह महान स्वर-साधिका हमेशा हमारे दिलों और सांस्कृतिक स्मृतियों में अमर रहेंगी।